महाराष्ट्र में गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों की संख्या भले ही सीमित हो, लेकिन राज्य की पीक डिमांड यानी अत्यधिक बिजली मांग को पूरा करने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका सीधा असर राज्य की बिजली व्यवस्था पर पड़ सकता है।
उरण और दाभोल जैसे संयंत्रों पर निर्भरता
राज्य का सबसे प्रमुख गैस आधारित बिजली संयंत्र उरण में स्थित महाजेनको का गैस टर्बाइन पावर स्टेशन है, जिसकी स्थापित क्षमता करीब 672 मेगावाट है। इसके अलावा रत्नागिरी के दाभोल में स्थित आरजीपीपीएल (RGPPL) जैसे निजी और संयुक्त क्षेत्र के बिजली संयंत्र भी प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं।
इन संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाली गैस का बड़ा हिस्सा विदेशों, खासकर खाड़ी देशों से आयात किया जाता है। यही वजह है कि वैश्विक स्तर पर गैस आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा सीधे इन संयंत्रों के संचालन को प्रभावित कर सकती है।
मिडिल ईस्ट संकट से गैस सप्लाई पर खतरा
मध्य पूर्व में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता और संभावित संघर्ष ने वैश्विक गैस आपूर्ति श्रृंखला को अस्थिर कर दिया है। भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है।
यदि यह संकट लंबा चलता है या होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं, तो गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इससे गैस आधारित बिजली उत्पादन महंगा और सीमित हो सकता है, जिसका सीधा असर महाराष्ट्र के पावर ग्रिड पर पड़ेगा।
मुंबई और पश्चिमी महाराष्ट्र पर सबसे ज्यादा असर
गैस आधारित संयंत्रों से बिजली उत्पादन में कमी का सबसे पहला असर मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई जैसे शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
मुंबई को बिजली आपूर्ति करने वाले टाटा पावर और अडानी इलेक्ट्रिसिटी जैसे वितरण नेटवर्क अक्सर पीक आवर्स में गैस आधारित बिजली का उपयोग करते हैं। उरण संयंत्र की भौगोलिक नजदीकी के कारण कोंकण बेल्ट और मुंबई महानगर क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित हो सकते हैं। इससे उद्योगों की उत्पादन क्षमता और घरेलू बिजली आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
पुणे-नासिक के औद्योगिक क्लस्टर पर भी संकट
पुणे और नासिक महाराष्ट्र के प्रमुख ऑटोमोबाइल और आईटी हब हैं, जहां बिजली की मांग लगातार बनी रहती है। यदि गैस की कमी के कारण ग्रिड की फ्रीक्वेंसी गिरती है, तो लोड शेडिंग की स्थिति पैदा हो सकती है।
गैस आधारित बिजली संयंत्रों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें कोयला आधारित संयंत्रों के मुकाबले बहुत तेजी से चालू और बंद किया जा सकता है। ऐसे में इन संयंत्रों की उपलब्धता कम होने का मतलब यह होगा कि अचानक बढ़ने वाली बिजली मांग को पूरा करने के लिए राज्य के पास तुरंत कोई बैकअप नहीं रहेगा।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए विकल्प तलाशने की चुनौती
संभावित संकट को देखते हुए राज्य सरकार और एमएसईबी कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने और सौर ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों पर जोर देने की दिशा में काम कर रहे हैं।
हालांकि अल्पकाल में मिडिल ईस्ट संकट का कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कमी बनी रहती है, तो महाराष्ट्र में न केवल बिजली उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि बिजली की दरों में भी बढ़ोतरी हो सकती है। आने वाले समय में राज्य को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए वैकल्पिक ईंधन और बेहतर ऊर्जा प्रबंधन पर अधिक ध्यान देना होगा।

