कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से बढ़ी बाजार की चिंता, 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है भाव

Thecity news
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वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है, जिसका असर घरेलू शेयर बाजारों पर भी पड़ रहा है। बढ़ती कीमतें निवेशकों और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मध्य पूर्व में तनाव जारी रहा तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड में तेजी

वैश्विक बेंचमार्क Brent Crude Oil की कीमत फिलहाल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। वहीं WTI Crude Oil फ्यूचर्स में भी लगभग 6 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है और इसकी कीमत करीब 96 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है।

विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में यह तेजी मुख्य रूप से Strait of Hormuz के रास्ते में बाधा और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण देखी जा रही है।

क्या 150 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल?

पिछले सप्ताह की शुरुआत में क्रूड ऑयल का भाव लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। हालांकि बाद में इसमें थोड़ी नरमी आई।

Kotak Securities से जुड़े एक्सपर्ट Anindya Banerjee का कहना है कि तकनीकी आधार पर कच्चे तेल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रेजिस्टेंस दिखा रही है। अगर यह स्तर टूटता है तो कीमत 145 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है।

शेयर बाजार पर पड़ सकता है बड़ा असर

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी दिखाई दे रहा है। भारत में Nifty 50 इंडेक्स मार्च के महीने में लगभग 8 प्रतिशत तक गिर चुका है

इसके अलावा विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी भी बाजार पर दबाव बना रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी शेयर बाजार के लिए नकारात्मक संकेत हो सकती है।

सोना और चांदी पर क्या होगा असर?

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सोने और चांदी की कीमतों पर सीधा असर सीमित हो सकता है। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना है।

डॉलर के मजबूत होने की स्थिति में निवेशक अक्सर सोने की जगह डॉलर में निवेश करना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में कीमती धातुओं की कीमतों में तेजी सीमित रह सकती है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दबाव

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी की वजह से दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों पर ब्याज दरों में कटौती का दबाव बढ़ सकता है। इससे वैश्विक आर्थिक नीतियों पर भी असर पड़ सकता है।

(यह निवेश की सलाह नहीं है। शेयर बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश से पहले विशेषज्ञों की सलाह अवश्य लें।)

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