मुंबई की पहचान माने जाने वाले वड़ा-पाव और इडली-डोसा के कारोबार पर अब एलपीजी संकट की मार पड़ने लगी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण शहर में घरेलू और कमर्शियल गैस की भारी कमी हो गई है, जिससे मुंबई के आधे से ज्यादा नाश्ते के स्टॉल बंद हो चुके हैं।
सुबह ऑफिस और काम पर जाने वाले लाखों मुंबईकर, जो फुटपाथों पर लगने वाले इन स्टॉलों से नाश्ता करते थे, अब उन्हें नाश्ते के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं जो स्टॉल खुले हैं, वहां कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
धारावी की छोटी इंडस्ट्री पर पड़ा सबसे बड़ा असर
मुंबई में सुबह मिलने वाला नाश्ता मुख्य रूप से धारावी की छोटी-छोटी इकाइयों से आता है। यहां बड़ी मात्रा में इडली, वड़ा और सांभर तैयार किया जाता है और फिर इन्हें साइकिलों और हाथगाड़ियों के जरिए पूरे शहर में बेचा जाता है।
लेकिन गैस सिलेंडर की कमी के कारण इन छोटी फैक्ट्रियों की भट्टियां ठंडी पड़ गई हैं। कारोबारियों का कहना है कि वे ब्लैक मार्केट में भी दोगुनी कीमत देकर गैस सिलेंडर नहीं खरीद पा रहे हैं, जिससे उनका पूरा व्यवसाय ठप होने की कगार पर पहुंच गया है।
‘इडली फैक्ट्री’ में एक दिन में बनती थीं लाखों इडली
धारावी की संकरी गलियों में कई ऐसी इकाइयां हैं जहां एक दिन में 1 लाख से ज्यादा इडली तैयार की जाती थीं। यहां से सैकड़ों छोटे वेंडर नाश्ता लेकर मुंबई के अलग-अलग इलाकों में बेचने जाते थे।
एक स्थानीय कारोबारी के मुताबिक गैस की कमी के कारण अब कच्चा माल खराब होने लगा है। भिगोए हुए चावल और उड़द की दाल फर्मेंट होकर झाग छोड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें पकाने के लिए ईंधन नहीं है। अगर जल्द ही हालात नहीं सुधरे तो कई मजदूर और छोटे व्यापारी गांव लौटने को मजबूर हो सकते हैं।
किराया और खर्च का दबाव भी बढ़ा
छोटे दुकानदारों और इडली विक्रेताओं के सामने सिर्फ धंधा बंद होने की समस्या नहीं है, बल्कि खर्चों का दबाव भी बढ़ गया है।
दुकानदारों का कहना है कि उन्हें उस जगह का किराया भी देना पड़ता है जहां वे स्टॉल लगाते हैं। जब कारोबार ही बंद हो जाए तो किराया चुकाना मुश्किल हो जाता है। एक दुकानदार के मुताबिक एक गैस सिलेंडर लगभग 5 दिन तक चलता है और महीने में कम से कम 6 सिलेंडरों की जरूरत होती है।
अब स्थिति यह है कि पुलिस भी दुकानदारों को गैस संकट के कारण फिलहाल स्टॉल बंद रखने की सलाह दे रही है।
वड़ा पाव और समोसा भी हुए महंगे
गैस की कमी का असर मुंबई की लाइफलाइन माने जाने वाले वड़ा पाव पर भी पड़ा है। कई बड़े वेंडरों ने उत्पादन कम कर दिया है।
कुछ दुकानदार कोयले या इलेक्ट्रिक स्टोव का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इससे लागत बढ़ गई है, जिसका असर सीधे ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा है। रेलवे स्टेशनों और बस डिपो के बाहर मिलने वाले नाश्ते के स्टॉल कम होने से उन लोगों की परेशानी बढ़ गई है, जो सुबह जल्दी घर से निकलते हैं और बाहर के नाश्ते पर ही निर्भर रहते हैं।

