23 सितंबर 2018 को रांची से शुरू हुई थी आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, 30 जून 2026 तक 1.92 लाख करोड़ रुपये के 12.69 करोड़ अस्पताल भर्ती मामलों को मिली मंजूरी
गंभीर बीमारी का इलाज गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए लंबे समय से बड़ी आर्थिक चुनौती रहा है। अस्पताल में भर्ती, ऑपरेशन, दवाइयों और जांच का खर्च कई बार परिवार की जमा-पूंजी पर भारी पड़ता है। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) शुरू की थी।
इस योजना की शुरुआत 23 सितंबर 2018 को झारखंड के रांची में हुई थी। इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को अस्पताल में भर्ती होने वाले गंभीर इलाज के लिए आर्थिक सुरक्षा देना था। योजना के तहत पात्र परिवार को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर दिया जाता है।
अब योजना को शुरू हुए आठ साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में इसके विस्तार और अब तक के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है।
महंगे इलाज का बोझ कम करना था मकसद
आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई का मुख्य उद्देश्य अस्पताल में भर्ती होने वाले इलाज पर लोगों की जेब से होने वाले खर्च को कम करना है। योजना के तहत पात्र परिवारों को सेकेंडरी और टर्शियरी स्तर के अस्पताल में भर्ती इलाज के लिए प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का कवर मिलता है।
शुरुआत में योजना का लक्ष्य देश की निचली 40 प्रतिशत आबादी के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा देना था। शुरुआती सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उस समय करीब 10.74 करोड़ परिवार, यानी लगभग 50 करोड़ लोगों को इसके दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया था।
शुरुआत में 10.74 करोड़ परिवार थे दायरे में
2018 में योजना शुरू करते समय करीब 10.74 करोड़ गरीब और कमजोर परिवारों को इसके तहत लाभ देने की व्यवस्था की गई थी। बाद में लाभार्थियों का दायरा बढ़ाकर करीब 12 करोड़ परिवारों तक किया गया। ये परिवार देश की आर्थिक रूप से कमजोर निचली 40 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
योजना में परिवार के सदस्यों की संख्या पर कोई सीमा नहीं रखी गई है और पात्रता के अनुसार लाभ दिया जाता है।
अस्पताल में इलाज के दौरान क्या मिलता है?
आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई से जुड़े सरकारी और निजी सूचीबद्ध अस्पतालों में पात्र लाभार्थी कैशलेस इलाज करा सकते हैं। योजना के तहत अस्पताल में भर्ती होने वाले इलाज से जुड़े कई खर्च कवर किए जाते हैं। इनमें चिकित्सा उपचार, सर्जरी और प्रक्रियाएं, दवाइयां, जरूरी जांच और अन्य निर्धारित अस्पताल सेवाएं शामिल हैं।
योजना की एक अहम सुविधा पोर्टेबिलिटी है। यानी पात्र व्यक्ति अपने राज्य से बाहर भी योजना से जुड़े दूसरे राज्य के सूचीबद्ध अस्पताल में इलाज करा सकता है। इससे दूसरे राज्यों में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों और इलाज के लिए दूसरे राज्य जाने वाले परिवारों को सुविधा मिलती है।
70 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग भी हुए शामिल
समय के साथ आयुष्मान भारत योजना का दायरा बढ़ाया गया। अक्टूबर 2024 में सरकार ने 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को उनकी आय या सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना योजना के तहत स्वास्थ्य कवर देने को मंजूरी दी।
इस विस्तार से करीब 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों और लगभग 4.5 करोड़ परिवारों को लाभ मिलने का अनुमान लगाया गया था। 70 वर्ष या उससे अधिक उम्र के पात्र बुजुर्गों के लिए अलग आयुष्मान कार्ड की व्यवस्था भी की गई।
आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के परिवार भी जुड़े
मार्च 2024 में योजना का विस्तार आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी सहायिकाओं तथा उनके परिवारों तक किया गया। इसके तहत करीब 37 लाख अतिरिक्त परिवार स्वास्थ्य कवरेज के दायरे में आए।
इस विस्तार के साथ योजना का कवरेज पहले की तुलना में और बढ़ गया।
30 जून 2026 तक 12.69 करोड़ अस्पताल भर्ती मामले
सरकार के ताजा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 30 जून 2026 तक आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई के तहत 12.69 करोड़ अस्पताल भर्ती मामलों को अधिकृत किया जा चुका था। इन उपचारों की कुल राशि करीब 1.92 लाख करोड़ रुपये थी।
इन उपचारों के लिए देशभर में 37,413 सरकारी और निजी अस्पतालों का नेटवर्क उपलब्ध था।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि आयुष्मान कार्ड की संख्या और अस्पताल में भर्ती मामलों की संख्या एक जैसी नहीं होती। किसी व्यक्ति का आयुष्मान कार्ड बनना अलग आंकड़ा है, जबकि उसी कार्ड के जरिए अस्पताल में भर्ती होकर इलाज कराना अलग आंकड़ा है।
सरकार के अगस्त 2026 के एक अन्य अपडेट के अनुसार, तब तक 45.5 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके थे।
लोगों की जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च घटा
आयुष्मान भारत की सफलता को समझने के लिए लोगों के अपनी जेब से किए जाने वाले स्वास्थ्य खर्च यानी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर के आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान 2022-23 के मुताबिक, कुल स्वास्थ्य खर्च में लोगों की जेब से होने वाले खर्च की हिस्सेदारी 2014-15 में 62.6 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत रह गई।
केंद्र सरकार ने इस कमी को स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़े सार्वजनिक निवेश और आयुष्मान भारत जैसी सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य योजनाओं के विस्तार से जोड़ा है। हालांकि, इस बदलाव को केवल आयुष्मान भारत योजना का परिणाम मानना सही नहीं होगा, क्योंकि स्वास्थ्य खर्च पर कई सरकारी और आर्थिक कारकों का असर पड़ता है।
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक पहुंच
जुलाई 2026 तक सरकार के अनुसार आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई का कार्यान्वयन सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हो रहा था। कई राज्यों ने अपनी स्वास्थ्य योजनाओं को भी पीएम-जेएवाई के साथ जोड़ा है, जिससे सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य कवरेज का दायरा और बढ़ा है।
आठ साल पहले आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को गंभीर बीमारी के इलाज में आर्थिक सुरक्षा देने के उद्देश्य से शुरू हुई योजना अब काफी बड़े स्तर पर पहुंच चुकी है। 30 जून 2026 तक 12.69 करोड़ अस्पताल भर्ती मामलों के लिए 1.92 लाख करोड़ रुपये के उपचार अधिकृत किए जा चुके थे, जबकि देशभर में हजारों सरकारी और निजी अस्पताल इसके नेटवर्क का हिस्सा थे।

