रबी 2026-27 की शुरुआत में यूरिया, डीएपी और एनपीकेएस का शुरुआती स्टॉक पिछले रबी सीजन के मुकाबले ऊंचा रहने का अनुमान है।
नई दिल्ली, 30 सितंबर।
आगामी रबी सीजन में खाद की उपलब्धता को लेकर सरकार ने किसानों को भरोसा दिया है। राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन रबी अभियान 2026-27 में उर्वरक विभाग ने बताया कि रबी सीजन की शुरुआत में देश में खाद का शुरुआती स्टॉक अब तक के ऊंचे स्तर पर रहने की उम्मीद है।
मंगलवार, 29 सितंबर को आयोजित सम्मेलन में बताया गया कि खरीफ 2026 के दौरान असाधारण भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद राज्यों ने खाद की उपलब्धता और वितरण का प्रभावी प्रबंधन किया। खाद के डायवर्जन को रोकने के लिए भी कई कदम उठाए गए।
सरकार के मुताबिक, खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता पर्याप्त बनी रही और रबी 2026-27 में भी हर राज्य को उसकी जरूरत के अनुसार खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
खरीफ सीजन में खाद की पर्याप्त उपलब्धता
उर्वरक विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अप्रैल से 27 सितंबर 2026 के बीच यूरिया की मौसमी जरूरत 190.32 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 249.69 लाख मीट्रिक टन रही। इस दौरान डीबीटी के जरिए 182.20 लाख मीट्रिक टन यूरिया की बिक्री हुई। 27 सितंबर तक राज्यों में 67.51 लाख मीट्रिक टन यूरिया का स्टॉक था, जबकि रास्ते में मौजूद खेप, बंदरगाहों और प्लांट सहित देश का कुल स्टॉक 81.39 लाख मीट्रिक टन रहा।
डीएपी की मौसमी जरूरत 56.23 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 69.47 लाख मीट्रिक टन रही। इस अवधि में डीबीटी के जरिए 46 लाख मीट्रिक टन डीएपी की बिक्री हुई। राज्यों में 23.48 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 29.21 लाख मीट्रिक टन डीएपी का स्टॉक उपलब्ध था।
एमओपी की मौसमी जरूरत 17.57 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 19.56 लाख मीट्रिक टन रही। इसकी डीबीटी बिक्री 9.43 लाख मीट्रिक टन हुई। राज्यों में 10.15 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 17.96 लाख मीट्रिक टन एमओपी का स्टॉक था।
एनपीकेएस की मौसमी जरूरत 84.99 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 108.24 लाख मीट्रिक टन रही। इसकी डीबीटी बिक्री 63.93 लाख मीट्रिक टन हुई। राज्यों में 44.32 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 54.90 लाख मीट्रिक टन एनपीकेएस का स्टॉक उपलब्ध था।
वहीं, एसएसपी की मौसमी जरूरत 34.81 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 48.84 लाख मीट्रिक टन रही। इसकी डीबीटी बिक्री 28.07 लाख मीट्रिक टन हुई। राज्यों में 20.88 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 22.89 लाख मीट्रिक टन एसएसपी का स्टॉक था।
रबी की शुरुआत में यूरिया और डीएपी का ऊंचा स्टॉक
उर्वरक विभाग के अनुमान के मुताबिक, रबी 2026-27 की शुरुआत में देश में यूरिया का स्टॉक 83.35 लाख मीट्रिक टन, डीएपी का 30.30 लाख मीट्रिक टन और एनपीकेएस का 56.58 लाख मीट्रिक टन रहने की उम्मीद है।
पिछले रबी सीजन यानी 2025-26 की शुरुआत में यूरिया का स्टॉक 54.08 लाख मीट्रिक टन, डीएपी का 27.80 लाख मीट्रिक टन और एनपीकेएस का 41.48 लाख मीट्रिक टन था। वहीं, रबी 2024-25 की शुरुआत में यूरिया का स्टॉक 72 लाख मीट्रिक टन, डीएपी का 16.72 लाख मीट्रिक टन और एनपीकेएस का 39 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया था।
पश्चिम एशिया संकट का खाद उत्पादन पर असर
पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर खाद उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस यानी आरएलएनजी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है। प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है और भारत अपनी यूरिया उत्पादन जरूरत की 80 प्रतिशत से अधिक गैस आयात करता है।
उर्वरक विभाग के मुताबिक, संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित हुई और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उत्पादकों का यूरिया उत्पादन घटा। भारत में भी युद्ध से पहले की तुलना में लंबी अवधि के गैस अनुबंधों के तहत गैस की आपूर्ति में करीब 60 से 65 प्रतिशत की कमी आई।
युद्ध से पहले गैस की कीमत करीब 10 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू थी, जो बाद में बढ़कर करीब 28 से 29 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू हो गई। इसके बावजूद भारत के 32 यूरिया संयंत्रों ने खरीफ 2026 सीजन में 149 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया।
सल्फर और फॉस्फोरिक एसिड की कीमतों में बढ़ोतरी
पश्चिम एशिया संकट का असर फॉस्फेट आधारित खादों के उत्पादन पर भी पड़ा है। सल्फर फॉस्फोरिक एसिड के उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है और इसका इस्तेमाल डीएपी तथा एनपीकेएस जैसे उर्वरकों के निर्माण में होता है।
वैश्विक बाजार में सल्फर की सीमित उपलब्धता के कारण इसकी कीमत फरवरी 2026 में 532 डॉलर प्रति टन से बढ़कर संकट के बाद 1,050 डॉलर प्रति टन हो गई। इसी तरह फॉस्फोरिक एसिड की कीमत 1,290 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,700 डॉलर प्रति टन पहुंच गई।
विभाग के अनुसार, वैश्विक स्तर पर सल्फर की कमी के कारण कई प्रमुख उत्पादकों ने फॉस्फोरिक एसिड, डीएपी और एनपीकेएस का उत्पादन कम कर दिया। भारत में भी घरेलू एनपीकेएस उत्पादन पिछले साल की तुलना में 26 लाख मीट्रिक टन घटा है।
डीएपी की लागत बढ़ी, फिर भी आयात जारी
युद्ध से पहले डीएपी की आयात और उत्पादन लागत करीब 681 डॉलर प्रति टन थी, जो बाद में बढ़कर 940 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई। इसके बावजूद सरकार ने घरेलू उत्पादन और डीएपी के आयात को जारी रखा, ताकि देश में खाद की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
यूरिया और डीएपी पर सब्सिडी बढ़ी
कच्चे माल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार ने यूरिया और डीएपी पर प्रति बोरी सब्सिडी भी बढ़ाई है। यूरिया पर प्रति बोरी अनुमानित सब्सिडी युद्ध से पहले करीब 1,350 रुपये थी, जो बाद में बढ़कर लगभग 2,775 रुपये हो गई।
वहीं, डीएपी पर प्रति बोरी अनुमानित सब्सिडी 2,192 रुपये से बढ़कर 3,523 रुपये पहुंच गई। उर्वरक विभाग ने कहा कि वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद हर राज्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।
राज्यों को खाद के इस्तेमाल को लेकर तीन निर्देश
राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में राज्यों से खाद के संतुलित और जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देने की अपील की गई। साथ ही तीन प्रमुख निर्देश दिए गए।
पहला, किसानों को जरूरत के मुताबिक उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने को कहा गया। दूसरा, खाद के गैर-निर्धारित इस्तेमाल और अवैध डायवर्जन को पूरी तरह रोकने की दिशा में काम करने का निर्देश दिया गया। तीसरा, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की अपील की गई।
उर्वरक विभाग ने खरीफ 2026 के दौरान राज्यों के खाद प्रबंधन की सराहना करते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बावजूद रबी 2026-27 के लिए देश में खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की तैयारी की गई है।

