बारां नगर परिषद की 60 सीटों में AAP ने 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया, कांग्रेस को 18 और बीजेपी को 9 सीटें मिलीं; राजस्थान के नतीजों ने पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ाई राजनीतिक हलचल
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो, लेकिन बारां के नतीजे ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए अलग राजनीतिक संदेश दिया है। बारां नगर परिषद में AAP ने कांग्रेस के करीब 15 साल पुराने कब्जे को खत्म करते हुए 60 में से 31 वार्ड जीतकर अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया। कांग्रेस को 18, बीजेपी को 9 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2 वार्ड में जीत मिली।
60 सदस्यीय परिषद में बहुमत के लिए 31 सीटों की जरूरत थी और AAP ने ठीक इतनी सीटें जीत लीं। ऐसे में बोर्ड बनाने के लिए पार्टी को किसी दूसरी पार्टी या निर्दलीय पार्षद के समर्थन की जरूरत नहीं पड़ेगी। राजस्थान में सीमित राजनीतिक आधार वाली AAP के लिए यह नतीजा स्थानीय राजनीति में एक अहम बढ़त माना जा रहा है।
बारां में कैसे बदला चुनावी समीकरण?
बारां में लंबे समय से मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जाता रहा था। इस बार AAP ने इस समीकरण को बदल दिया। पार्टी ने स्थानीय मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व पर जोर देते हुए चुनाव लड़ा और स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
बारां नगर परिषद का परिणाम:
- AAP: 31 वार्ड
- कांग्रेस: 18 वार्ड
- बीजेपी: 9 वार्ड
- निर्दलीय: 2 वार्ड
AAP के अभियान का नेतृत्व बारां नगर परिषद के पूर्व सभापति कमल राठौड़ ने किया। राठौड़ ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी। इसके बाद वह बीजेपी और कांग्रेस में भी रहे।
रिपोर्ट के मुताबिक, बारां में AAP के प्रचार में अरविंद केजरीवाल के नाम या तस्वीर को प्रमुखता नहीं दी गई। पार्टी ने स्थानीय चेहरे और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखा।
सभापति पद पर शीतल राठौड़ की नजर
AAP के बहुमत हासिल करने के बाद अब बारां नगर परिषद के सभापति पद को लेकर भी चर्चा तेज है। सभापति का पद सामान्य वर्ग की महिला के लिए आरक्षित है।
कमल राठौड़ की पत्नी शीतल राठौड़ ने भी वार्ड 37 से चुनाव जीता है और उन्हें सभापति पद की मजबूत दावेदार माना जा रहा है।
वार्ड 46 से AAP उम्मीदवार कमल राठौड़ ने जीत के बाद कहा कि बारां की जनता ने विकास को चुना है। उन्होंने दावा किया कि जनता ने भ्रष्ट नेताओं को नकार दिया है और अब पार्टी की प्राथमिकता लोगों की उम्मीदों को पूरा करना होगी।
नोखा में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला
राजस्थान के नोखा में कांग्रेस के लिए नतीजे और ज्यादा चिंताजनक रहे। 45 वार्ड वाली नोखा नगर पालिका में सीपीआई (एम) ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बढ़त हासिल की। बीजेपी को 13 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 3 सीटें मिलीं। कांग्रेस एक भी वार्ड जीतने में सफल नहीं रही।
सीपीआई (एम) ने अपनी जीत के पीछे स्थानीय और आर्थिक मुद्दों को लेकर लंबे समय से चलाए जा रहे अभियान को अहम बताया है। पार्टी का दावा है कि बीजेपी से नाराजगी और कांग्रेस की कमजोर मौजूदगी ने उसे राजनीतिक जगह बनाने का मौका दिया।
इन नतीजों से यह संकेत भी मिलता है कि राजस्थान में विपक्षी राजनीति का पूरा स्पेस केवल कांग्रेस और बीजेपी तक सीमित नहीं है। कुछ क्षेत्रों में मतदाता तीसरे विकल्प की ओर भी जाते दिखाई दिए हैं।
पूरे राजस्थान में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी
हालांकि बारां और नोखा के नतीजे चर्चा में हैं, लेकिन पूरे राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
राज्य के 309 शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव में बीजेपी ने कुल 4,179 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,613 वार्ड मिले। बीजेपी ने 10 नगर निगमों में से चार में स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
अन्य दलों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने 63, AAP ने 42, माकपा ने 38, बसपा ने 19 और भारत आदिवासी पार्टी ने 8 वार्ड जीते। इन चुनावों में 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाएं शामिल थीं।
यानी राजस्थान का बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि बीजेपी राज्य में मजबूत स्थिति में है, लेकिन जहां कांग्रेस कमजोर पड़ती है, वहां उसके विपक्षी वोटों के लिए AAP और दूसरे दल भी जगह बना सकते हैं।
अब पंजाब चुनाव पर नजर, जहां AAP की सरकार
राजस्थान के बारां में AAP की जीत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। 2022 में AAP ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। कांग्रेस को 18 सीटें मिली थीं और वह मुख्य विपक्षी दल बनी थी।
अब 2027 के चुनाव में राजनीतिक समीकरण पहले से अलग हैं। AAP सत्ता बरकरार रखने की कोशिश कर रही है, कांग्रेस सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है, बीजेपी सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कह रही है और शिरोमणि अकाली दल भी अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने में जुटा है।
ऐसे में पंजाब का मुकाबला अब केवल AAP और कांग्रेस के बीच सीमित रहने वाला नहीं है।
कांग्रेस के लिए राजस्थान का क्या संदेश?
बारां में AAP की जीत को पंजाब के संदर्भ में देखें तो कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी वोटों के बंटवारे की हो सकती है। केवल सत्ता विरोधी भावना का फायदा कांग्रेस को अपने आप मिल जाएगा, यह जरूरी नहीं है।
अगर AAP के खिलाफ वोट अलग-अलग विपक्षी विकल्पों में बंटते हैं तो कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी मुश्किल हो सकती है। पंजाब में कांग्रेस इसी चुनौती को देखते हुए संगठन को मजबूत करने में जुटी है।
पार्टी ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया है और संगठन को एकजुट करने की कोशिश शुरू की है। कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया है कि विधानसभा चुनाव से पहले किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया जाएगा।
AAP के सामने भी 2027 की चुनौती बड़ी
राजस्थान में मिली जीत AAP के लिए निश्चित तौर पर उत्साह बढ़ाने वाली है, लेकिन पंजाब में उसकी स्थिति अलग है। वहां पार्टी खुद सत्ता में है। इसलिए 2027 के चुनाव में उसे विपक्षी दल के तौर पर नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज के आधार पर जनता के सामने जाना होगा।
2022 में मिले 92 सीटों के भारी बहुमत को दोहराना AAP के लिए आसान चुनौती नहीं होगी। सत्ता विरोधी भावना, आर्थिक मुद्दे और विपक्षी दलों की सक्रियता चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
AAP ने भी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है और 117 विधानसभा सीटों पर जमीनी फीडबैक के आधार पर संभावित उम्मीदवारों की पहचान की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।
पंजाब में बीजेपी भी बदल रही रणनीति
पंजाब में बीजेपी की भूमिका भी इस बार पहले से अलग दिखाई दे सकती है। पार्टी फिलहाल सभी 117 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही है।
बीजेपी का फोकस अपराध, भ्रष्टाचार और नशे जैसे मुद्दों पर रहने की संभावना है। पार्टी अपने पारंपरिक शहरी आधार को मजबूत करने के साथ दूसरे सामाजिक और राजनीतिक समूहों तक भी पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।
हालांकि, बीजेपी और अकाली दल के बीच भविष्य में गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चा जारी है। ऐसे में 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव का अंतिम राजनीतिक समीकरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

