चार राज्यों की 27 सीटों के नतीजों में बीजेपी और एनडीए का दबदबा रहा, जबकि कांग्रेस कई राज्यों में खाता खोलने में भी नाकाम रही।
देश के चार राज्यों में विधान परिषद की 28 एमएलसी सीटों में से 27 के नतीजे घोषित हो चुके हैं। इन चुनावों में एनडीए ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि बीजेपी के खाते में 13 सीटें आईं। कांग्रेस को केवल एक सीट मिली। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने चार सीटें जीतीं और एक सीट पर आगे रही। वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती जारी है, जहां सपा उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं।
महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की। बिहार और कर्नाटक में कांग्रेस का खाता नहीं खुल पाया। बिहार में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी अपना खाता खोलने में सफल रही।
इन नतीजों ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति और संगठन की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों में पार्टी की हार के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं।
1. बिहार में महागठबंधन के बीच बिखराव
बिहार में आठ सीटों पर हुए एमएलसी चुनाव में महागठबंधन के घटक दलों के बीच एकजुटता की कमी दिखाई दी। कांग्रेस, आरजेडी और वामपंथी दलों ने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे, जिससे विपक्षी वोटों के बंटने की स्थिति बनी।
कांग्रेस और आरजेडी ने पटना शिक्षक, पटना स्नातक, दरभंगा शिक्षक, दरभंगा स्नातक और कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे। दरभंगा शिक्षक सीट पर कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी भी चुनाव मैदान में थे। शुरुआत में आरजेडी ने यहां उम्मीदवार नहीं उतारा था, लेकिन कांग्रेस के पांचों निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशी खड़े करने के फैसले के बाद आरजेडी ने भी अपना उम्मीदवार उतार दिया। सीपीएम ने भी इस सीट पर प्रत्याशी घोषित किया।
नतीजतन, कांग्रेस के मदन मोहन झा को 2,187 वोट और रामदेव राय को 1,498 वोट मिले, जबकि आरजेडी उम्मीदवार कुमार राउत को 126 वोट मिले। कांग्रेस यह सीट जन सुराज के उम्मीदवार से 324 वोटों के अंतर से हार गई। इस नतीजे को सहयोगी दलों के बीच तालमेल की कमी से जोड़कर देखा जा रहा है।
बिहार में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं?
बिहार की सभी आठ एमएलसी सीटों के नतीजों में बीजेपी ने तीन सीटें जीतीं। जेडीयू, आरजेडी और जन सुराज को एक-एक सीट मिली, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस यहां कोई सीट नहीं जीत सकी।
पटना स्नातक सीट पर जेडीयू के नीरज कुमार ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। जन सुराज के उम्मीदवार अनुज सिंह तीसरे स्थान पर रहे।
2. संगठन की जमीनी कमजोरी
कांग्रेस के सामने संगठन को बूथ और स्थानीय स्तर पर मजबूत करने की चुनौती भी है। एमएलसी चुनाव वाले राज्यों में पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ा। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद पार्टी चारों सीटें हार गई।
कर्नाटक में बीजेपी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी जेडीएस को एक सीट मिली। जेडीएस के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के पांच बार के एमएलसी और विधान परिषद में उपनेता पुट्टन्ना को हराया। यह नतीजा दिखाता है कि सत्ता में होने के बावजूद स्थानीय चुनावों में जीत की गारंटी नहीं होती।
3. उम्मीदवारों के चयन में चूक
कांग्रेस की हार की एक वजह उम्मीदवारों के चयन को भी माना जा रहा है। पार्टी पर आरोप है कि कुछ सीटों पर जिताऊ उम्मीदवारों के बजाय बड़े नेताओं के करीबी लोगों को प्राथमिकता दी गई। इसके मुकाबले बीजेपी, सपा और दूसरे दलों ने स्थानीय समीकरणों के हिसाब से उम्मीदवार उतारे।
एमएलसी चुनावों में उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच संपर्क तथा संगठन का समर्थन अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में प्रत्याशी चयन में चूक पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
4. राहुल गांधी के मुद्दों को जमीन पर नहीं उतार पाई पार्टी
राहुल गांधी बेरोजगारी, पेपर लीक, सरकारी नौकरियों में कथित अनियमितताओं और वोट चोरी जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं। इन मुद्दों के जरिए कांग्रेस युवाओं और आम मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करती रही है।
हालांकि, इन चुनावों में पार्टी इन मुद्दों को स्थानीय स्तर पर प्रभावी चुनावी अभियान में बदलने में सफल नहीं दिखी। राजनीतिक संदेश तभी असरदार होता है, जब स्थानीय नेता और संगठन उसे मतदाताओं तक लगातार पहुंचाएं। कांग्रेस की हार के बाद उसके राष्ट्रीय मुद्दों और जमीनी चुनावी रणनीति के बीच तालमेल पर सवाल उठ रहे हैं।
5. नेताओं के विवादित बयान
चुनाव के दौरान नेताओं के बयान भी राजनीतिक बहस का मुद्दा बनते हैं। कांग्रेस के कुछ नेताओं के विवादित बयानों को बीजेपी ने निशाना बनाया है। हाल में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद हुआ था। बीजेपी ने आरोप लगाया कि खरगे ने प्रधानमंत्री के पिता को लेकर अपमानजनक बात कही। कांग्रेस नेता दानिश अली के वोट चोरी से जुड़े बयान पर भी राजनीतिक विवाद हुआ।
ऐसे बयान चुनावी मुद्दों से ध्यान हटाकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को केंद्र में ला सकते हैं। हालांकि, एमएलसी चुनाव में कांग्रेस की हार का कारण केवल विवादित बयानों को मानना सही नहीं होगा। संगठन, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय समीकरण और विपक्षी दलों के बीच तालमेल जैसे पहलू भी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
इन चुनावों के नतीजे कांग्रेस के लिए संगठनात्मक मजबूती और स्थानीय रणनीति पर दोबारा विचार करने का संकेत हैं। आने वाले चुनावों में पार्टी की चुनौती राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय स्तर पर प्रभावी अभियान में बदलने और सहयोगी दलों के साथ बेहतर तालमेल बनाने की होगी।

