ग्रीन रूफ के ऊपर लगाए जाते हैं सोलर पैनल, पौधे छत और पैनल का तापमान नियंत्रित करने में मदद करते हैं; लगाने से पहले स्ट्रक्चरल ऑडिट जरूरी
सोलर पैनल के जरिए बिजली पैदा करना अब घरों और कंपनियों में तेजी से आम हो रहा है। लेकिन क्या आपने Bio-Solar Roof के बारे में सुना है? यह ऐसी तकनीक है जिसमें सोलर पैनल के साथ छत पर पौधों और हरियाली का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें फोटोवोल्टिक सोलर पैनल को ग्रीन रूफ के ऊपर लगाया जाता है। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ-साथ छत और पैनल के आसपास के तापमान को नियंत्रित करना है, जिससे इमारत और सोलर सिस्टम की कार्यक्षमता बेहतर हो सके।
क्या है Bio-Solar तकनीक?
आसान भाषा में समझें तो Bio-Solar तकनीक में फोटोवोल्टिक सोलर पैनल और ग्रीन रूफ को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। छत पर मिट्टी, सेडम या छोटे पौधों की हरित परत तैयार की जाती है और उसके ऊपर कुछ ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं।
इस व्यवस्था में पौधे आसपास के वातावरण को ठंडा रखने में मदद कर सकते हैं, जबकि सोलर पैनल पौधों को कुछ हद तक सीधी धूप से बचाने के लिए छांव उपलब्ध कराते हैं। यानी एक ही छत पर बिजली उत्पादन और हरियाली का संयोजन तैयार हो जाता है।
आम Solar System से कैसे अलग है?
आमतौर पर सोलर पैनल कंक्रीट, टीन शेड या डामर जैसी सतहों पर लगाए जाते हैं। तेज धूप में इन सतहों का तापमान काफी बढ़ सकता है। ज्यादा तापमान सोलर पैनल की दक्षता को प्रभावित कर सकता है।
Bio-Solar Roof में पौधे वाष्पोत्सर्जन के जरिए आसपास के वातावरण को ठंडा रखने में मदद करते हैं। इससे पैनलों के आसपास का तापमान अपेक्षाकृत नियंत्रित रह सकता है। कुछ शोध और रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि ठंडे वातावरण के कारण ऐसे सिस्टम में सोलर पैनल से 5 से 15 प्रतिशत तक अधिक बिजली उत्पादन संभव हो सकता है। हालांकि, वास्तविक लाभ मौसम, पौधों की प्रजाति, सिस्टम डिजाइन और इंस्टॉलेशन जैसी कई परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
बिजली के साथ घर भी रह सकता है ठंडा
Bio-Solar Roof का फायदा केवल सोलर पैनल तक सीमित नहीं माना जाता। छत पर हरियाली होने से सूर्य की गर्मी का सीधा असर छत पर कम हो सकता है। इससे इमारत के अंदर का तापमान नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है और गर्मियों में एयर कंडीशनर या कूलर पर पड़ने वाला लोड भी घट सकता है।
ऑन-ग्रिड सोलर सिस्टम में अतिरिक्त बिजली उत्पादन से बिजली के बिल को कम करने में मदद मिल सकती है। वहीं, ऑफ-ग्रिड सिस्टम में अतिरिक्त बिजली को बैटरी में स्टोर किया जा सकता है।
Bio-Solar Roof लगवाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
भारत में Bio-Solar Roof अभी शुरुआती दौर की तकनीक है। इसे लगवाने से पहले छत का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराना जरूरी है। मिट्टी, पौधों और पानी की वजह से छत पर अतिरिक्त भार बढ़ सकता है, इसलिए भवन की भार सहने की क्षमता की जांच आवश्यक है।
इसके अलावा, उचित ड्रेनेज सिस्टम, पौधों की नियमित छंटाई और पैनलों पर अनावश्यक छाया न पड़ने की व्यवस्था भी जरूरी है। Bio-Solar Roof की लागत तय करते समय केवल सोलर पैनल का खर्च नहीं, बल्कि ग्रीन रूफ तैयार करने और उसके रखरखाव का खर्च भी शामिल करना चाहिए।
महत्वपूर्ण बातें
- Bio-Solar Roof में सोलर पैनल और ग्रीन रूफ को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है।
- पौधे आसपास का तापमान नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं।
- कुछ रिपोर्टों में बिजली उत्पादन 5 से 15 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना बताई गई है।
- वास्तविक फायदा मौसम, पौधों, डिजाइन और इंस्टॉलेशन पर निर्भर करता है।
- लगाने से पहले छत की संरचनात्मक क्षमता, ड्रेनेज और रखरखाव की जांच जरूरी है।

