मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती पेयजल समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि स्वच्छ और पीने योग्य पानी तक पहुंच प्रत्येक नागरिक का बुनियादी अधिकार है। अदालत ने राज्य सरकार से यह भी पूछा कि जल संकट की समस्या का स्थायी समाधान कब तक किया जाएगा।
मेलघाट में जल संकट और कुपोषण मामलों की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ विदर्भ के अमरावती जिले स्थित आदिवासी बहुल मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण के कारण शिशुओं, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मौत से संबंधित विभिन्न जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल की गंभीर कमी का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा गया।
दूषित पानी से मौतों पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि गर्मी के मौसम में तापमान बढ़ने के साथ मेलघाट क्षेत्र में स्वच्छ पानी की उपलब्धता और भी गंभीर समस्या बन जाती है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को अवगत कराया कि दूषित पानी के सेवन के कारण क्षेत्र में 13 लोगों की मौत हो चुकी है, जिससे स्थिति की गंभीरता स्पष्ट होती है।
टैंकरों से जल आपूर्ति पर उठे सवाल
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रभावित क्षेत्रों में समय-समय पर पेयजल टैंकर भेजे जा रहे हैं और लोगों को पानी उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि जल आपूर्ति नियमित नहीं है और कई गांवों में लोगों को अब भी पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है।
स्थायी समाधान की दिशा में सरकार से मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अस्थायी उपायों से समस्या का समाधान संभव नहीं है और सरकार को जल संकट के स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। अदालत ने राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है।
जल प्रबंधन और संरक्षण पर फिर छिड़ी बहस
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद राज्य में जल प्रबंधन, पेयजल आपूर्ति और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं, वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण अभियानों और ग्रामीण जलापूर्ति ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है।
अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले कदम और अदालत में प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला हजारों ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है।

