नई दिल्ली: भारत में पहली बार निजी क्षेत्र की गोल्ड माइन शुरू होने के बाद देश में सोने के उत्पादन को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव में स्थापित देश की पहली प्राइवेट गोल्ड माइन ‘स्वर्णगिरी’ को भारत के खनन क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। शुरुआती अनुमान के अनुसार यहां 13 टन से अधिक सोने का भंडार मौजूद है, जबकि विस्तृत सर्वेक्षण के बाद यह आंकड़ा 42 टन तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि भविष्य में ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी निजी गोल्ड माइनिंग परियोजनाओं को मंजूरी मिल सकती है।
क्या है स्वर्णगिरी प्रोजेक्ट?
आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले के जोन्नागिरी गांव में करीब 400 करोड़ रुपये की लागत से विकसित की गई ‘स्वर्णगिरी’ भारत की पहली निजी गोल्ड माइन है। यह परियोजना देश में निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ सोने के उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। शुरुआती चरण में यहां सीमित उत्पादन होगा, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा।
निजी कंपनी कितना सोना निकाल सकती है?
भारत में किसी भी निजी कंपनी को अपनी इच्छा के अनुसार खनन करने की अनुमति नहीं होती। खनन की मात्रा सरकार द्वारा स्वीकृत भंडार और वैज्ञानिक उत्पादन योजना के आधार पर तय की जाती है। स्वर्णगिरी परियोजना में संभावित भंडार 42 टन तक होने का अनुमान है, लेकिन पहले वर्ष में केवल लगभग 400 किलोग्राम सोने का उत्पादन होने की संभावना है। बाद के वर्षों में इसे बढ़ाकर 900 किलोग्राम से 1 टन प्रति वर्ष तक किया जा सकता है।
भारत में गोल्ड माइनिंग के क्या हैं नियम?
भारत में सोना सहित सभी प्रमुख खनिजों का खनन खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत नियंत्रित होता है। किसी भी निजी कंपनी को खनन शुरू करने से पहले राज्य सरकार द्वारा खनिज ब्लॉक की नीलामी में सफल होना पड़ता है। इसके बाद विस्तृत भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण, खनिज भंडार का वैज्ञानिक मूल्यांकन, पर्यावरण और वन मंजूरी सहित कई नियामकीय प्रक्रियाओं को पूरा करना अनिवार्य होता है।
खनन के दौरान कंपनियों को रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (DMF), राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट (NMET) सहित अन्य निर्धारित शुल्क भी जमा करने होते हैं। खनिज संसाधनों का स्वामित्व राज्य सरकार के पास ही रहता है।
किन राज्यों में खुल सकती हैं नई गोल्ड माइंस?
स्वर्णगिरी के बाद देश के कई राज्यों में सोने के संभावित भंडार मिलने की संभावना जताई जा रही है।
- ओडिशा: देवगढ़, क्योंझर और मयूरभंज जिलों में सोने के भंडार के संकेत मिले हैं।
- कर्नाटक: कोप्पल और रायचूर क्षेत्रों में 12 से 14 ग्राम प्रति टन तक सोने की ग्रेडिंग दर्ज की गई है।
- मध्य प्रदेश: जबलपुर की महाकौशल बेल्ट में सोने के संभावित भंडार की पहचान हुई है, जिससे भविष्य में सोना और तांबा आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिल सकता है।
भारत खपत में आगे, उत्पादन में क्यों पीछे?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में हर वर्ष करीब 700 से 800 टन सोने की खपत होती है, जबकि इसका लगभग 99 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सोने की खोज पर सीमित निवेश, लंबी नियामकीय प्रक्रियाएं और दशकों तक अन्य खनिजों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण भारत घरेलू उत्पादन में पिछड़ गया।
कोलार गोल्ड फील्ड बंद होने के बाद बढ़ी आयात पर निर्भरता
कर्नाटक स्थित कोलार गोल्ड फील्ड (KGF) कभी भारत की सबसे बड़ी सोने की खदान थी। 1880 के दशक से शुरू हुई इस खदान से करीब 120 वर्षों में 800 टन से अधिक सोना निकाला गया। वर्ष 2001 में इसके बंद होने के बाद देश का घरेलू उत्पादन तेजी से घट गया और भारत को अपनी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर होना पड़ा।
क्या कम होगा सोने का आयात?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल स्वर्णगिरी जैसी परियोजनाएं भारत की कुल सोने की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि यदि आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में नए भंडार विकसित होते हैं, तो भविष्य में घरेलू उत्पादन बढ़ेगा, आयात पर निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ स्थानीय रोजगार एवं औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

