देश में मेडिकल (MBBS) सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा और भारी-भरकम डोनेशन की मांग कोई नई बात नहीं है। लेकिन एक मेधावी छात्र की कहानी आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। इस छात्र ने लगभग 1 करोड़ रुपये की मैनेजमेंट कोटा MBBS सीट को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसे अपनी मेहनत और मेरिट पर पूरा भरोसा था।
डोनेशन सीट को ठुकराने का बड़ा फैसला
डॉक्टर अंशुल साधले ने पहले प्रयास में एक निजी मेडिकल कॉलेज में मैनेजमेंट कोटा की सीट हासिल कर ली थी। कॉलेज की फीस और डोनेशन मिलाकर कुल रकम करीब ₹1 करोड़ पड़ रही थी।
उनके पिता सीट लेने को तैयार थे, लेकिन अंशुल ने साफ कहा:
“मैं पापा के पैसे से नहीं, अपनी मेहनत से मेडिकल सीट पाना चाहता हूँ।”
यह निर्णय आसान नहीं था—एक साल का समय दांव पर लगाना किसी भी छात्र के लिए बड़ा जोखिम होता है।
ड्रॉप ईयर में की कड़ी मेहनत — और मिला परिणाम
सीट ठुकराने के बाद अंशुल ने ड्रॉप ईयर लिया और पूरी एकाग्रता से NEET की तैयारी शुरू कर दी।
दिन-रात मेहनत, सही रणनीति और आत्मविश्वास ने आखिरकार कमाल कर दिया।
अगले प्रयास में उन्होंने लगभग 7000 रैंक हासिल की और बिना किसी डोनेशन के,
सरकारी/मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेज में MBBS सीट सुनिश्चित कर ली।
युवाओं के लिए प्रेरणा
अंशुल साधले की कहानी यह बताती है कि—
✨ सच्ची सफलता पैसे से नहीं, मेहनत से मिलती है।
✨ डोनेशन से मिली सीट सम्मान नहीं देती, लेकिन मेरिट से मिला एडमिशन गर्व देता है।
✨ आत्मविश्वास और लगन किसी भी बैंक बैलेंस से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
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