43 साल पुराने सरकारी चिप प्लांट का कायाकल्प अटका, SCL मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट को अब भी मंजूरी का इंतजार

Thecity news
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4,500 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना छह महीने से फाइलों में अटकी, कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही शुरू होगा काम

भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार लगातार बड़े कदम उठा रही है। देश में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम विकसित करने के उद्देश्य से कई नई परियोजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन भारत का सबसे पुराना सरकारी चिप निर्माण संयंत्र अब भी अपने आधुनिकीकरण का इंतजार कर रहा है। पंजाब के मोहाली स्थित सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL) के 4,500 करोड़ रुपये के मॉडर्नाइजेशन प्रोजेक्ट को छह महीने बाद भी अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है।

सरकारी अधिकारियों और उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, दिसंबर 2025 में तीन निजी कंपनियों का चयन होने के बावजूद परियोजना अभी भी कैबिनेट की मंजूरी और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटकी हुई है। मंजूरी मिलने के बाद ही संबंधित कंपनियों को औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट जारी किए जाएंगे।

तीन कंपनियों का हुआ था चयन

4 दिसंबर 2025 को टाटा सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, साइएंट सेमीकंडक्टर्स और एप्लाइड मैटेरियल्स को SCL के आधुनिकीकरण के लिए पसंदीदा बोलीदाता चुना गया था। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 4,500 करोड़ रुपये है। अधिकारियों का कहना है कि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी आवश्यक है, जिसके लिए जरूरी दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं।

1984 में शुरू हुआ था भारत का पहला सरकारी चिप प्लांट

मोहाली स्थित SCL की स्थापना वर्ष 1984 में की गई थी। यह दुनिया की प्रमुख चिप निर्माता कंपनी TSMC के गठन से भी पहले अस्तित्व में आ गया था। इसका उद्देश्य भारत को उभरती वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना था। हालांकि 1989 में लगी रहस्यमयी आग ने प्लांट की अधिकांश मशीनरी को नुकसान पहुंचा दिया, जिसके बाद यह संयंत्र कभी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर सका।

वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने SCL के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए लगभग 10,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की थी। मौजूदा 4,500 करोड़ रुपये की योजना इसी बड़े बजट का हिस्सा मानी जा रही है।

कहां फंसा है प्रोजेक्ट?

सूत्रों के मुताबिक, परियोजना में देरी की प्रमुख वजह प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं। केंद्र सरकार मौजूदा प्लांट के आधुनिकीकरण के साथ-साथ इसके विस्तार की योजना पर भी विचार कर रही है। इसके अलावा अतिरिक्त जमीन के आवंटन और उसकी कीमत को लेकर पंजाब सरकार और केंद्र के बीच भी सहमति बनना बाकी है।

इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक इन मुद्दों पर अंतिम फैसला नहीं होता, तब तक निजी कंपनियां परियोजना पर वास्तविक काम शुरू नहीं कर पाएंगी।

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 से जुड़ी उम्मीदें

यह देरी ऐसे समय में हो रही है जब केंद्र सरकार ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ के तहत करीब 1.25 लाख करोड़ रुपये के नए प्रोत्साहन पैकेज की तैयारी कर रही है। माना जा रहा है कि 2026 के अंत तक इस मिशन को अधिसूचित किया जा सकता है, जिससे देश में चिप निर्माण की पूरी वैल्यू चेन विकसित करने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) मिशन 2.0 के अगले चरण की मंजूरी के साथ SCL परियोजना को भी अंतिम स्वीकृति दे सकता है।

क्या होगा अपग्रेड प्लान?

SCL की मौजूदा 180 नैनोमीटर फैब्रिकेशन लाइन को आधुनिक बनाया जाएगा। इसके तहत दशकों पुराने उपकरण बदले जाएंगे और उत्पादन क्षमता 700 वेफर स्टार्ट्स प्रति माह (WSPM) से बढ़ाकर 1,500 WSPM करने का लक्ष्य रखा गया है।

हालांकि दुनिया में आज 2 नैनोमीटर तक की अत्याधुनिक चिप्स बनाई जा रही हैं, लेकिन 180 नैनोमीटर तकनीक का उपयोग आज भी रक्षा, अंतरिक्ष, मेडिकल डिवाइस, माइक्रोकंट्रोलर और पावर मैनेजमेंट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जाता है।

तीनों कंपनियों की क्या होगी जिम्मेदारी?

परियोजना में तीनों कंपनियों की अलग-अलग भूमिका तय की गई है। टाटा सेमीकंडक्टर मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर का मूल्यांकन, उपकरणों के अपग्रेड और इंस्टॉलेशन का काम संभालेगी। साइएंट सेमीकंडक्टर्स विभिन्न प्रकार की चिप निर्माण तकनीक उपलब्ध कराएगी, जबकि एप्लाइड मैटेरियल्स प्लांट के संचालन के लिए सॉफ्टवेयर और ऑटोमेशन सिस्टम विकसित करेगी।

इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना रद्द नहीं हुई है, बल्कि प्रशासनिक मंजूरियों के कारण इसमें देरी हो रही है। उनका मानना है कि SCL भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है और इसके आधुनिकीकरण से देश की चिप डिजाइन, रिसर्च, प्रोटोटाइप निर्माण और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई मजबूती मिलेगी।

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