इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरे पर जाएंगे PM मोदी, ब्रह्मोस मिसाइल समझौते पर दुनिया की नजर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के महत्वपूर्ण दौरे पर रवाना होंगे। हालांकि इस यात्रा का सबसे अहम पड़ाव इंडोनेशिया माना जा रहा है, जहां भारत और इंडोनेशिया के बीच बहुप्रतीक्षित ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर अंतिम मुहर लगने की संभावना है। यह समझौता भारत के रक्षा निर्यात और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के लिए बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता है।
भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए दोनों देशों ने ‘डिफेंस इंडस्ट्री कोऑपरेशन कमेटी’ का गठन भी किया है। यह समिति मिसाइल आपूर्ति के साथ-साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, संयुक्त अनुसंधान और रक्षा सप्लाई चेन को मजबूत करने पर काम करेगी। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी।
चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच रणनीतिक रूप से अहम डील
ब्रह्मोस मिसाइल सौदा केवल रक्षा व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामरिक मायने भी हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और विस्तारवादी नीति के बीच यह मिसाइल इंडोनेशिया समेत क्षेत्र के देशों की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगी। लंबी दूरी तक सटीक निशाना साधने वाली ब्रह्मोस मिसाइल चीन की नौसैनिक गतिविधियों के खिलाफ प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता प्रदान कर सकती है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में बनेगी ‘ब्रह्मोस चेन’
यदि इंडोनेशिया यह मिसाइल खरीदता है, तो वह फिलीपींस और वियतनाम के बाद ब्रह्मोस का तीसरा दक्षिण-पूर्व एशियाई ऑपरेटर बन जाएगा। फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली खरीद चुका है, जबकि वियतनाम के साथ भी करीब 5,800 करोड़ रुपये का समझौता हो चुका है।
इसके अलावा मलेशिया और थाईलैंड ने भी इस मिसाइल प्रणाली में रुचि दिखाई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये देश भी ब्रह्मोस खरीदते हैं, तो दक्षिण-पूर्व एशिया के सामरिक समुद्री क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी और प्रभाव काफी मजबूत हो जाएगा।
क्यों खास है ब्रह्मोस मिसाइल?
ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है। इसकी गति ध्वनि की रफ्तार से लगभग तीन गुना तक होती है, जिससे दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम के लिए इसे रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है।
इस मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी बहुउपयोगी क्षमता है। इसे जमीन, समुद्र और हवा—तीनों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है। यही वजह है कि समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में कई देश इसे अपनी पहली पसंद के रूप में देख रहे हैं।

