28 वर्षीय वृंदाणी पटेल, जिनकी ऊंचाई मात्र 2 फीट है, ने समाजिक भेदभाव और कई रिजेक्शन के बावजूद Ph.D. पूरी की और अहमदाबाद के प्रतिष्ठित कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बनीं। उनकी प्रेरक कहानी पढ़ें।
कद छोटा, हौसला बड़ा — 2 फीट की वृंदाणी पटेल बनीं कॉलेज प्रोफेसर
अहमदाबाद, 11 दिसंबर 2025 — कामयाबी न ऊंचाई देखती है और न कोई सीमा। गुजरात की 28 वर्षीय वृंदाणी पटेल ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। केवल दो फीट की ऊंचाई बावजूद, उन्होंने समाज की रूढ़िवादी सोच, लगातार रिजेक्शन और शारीरिक चुनौतियों का सामना किया—और आज वह अहमदाबाद के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुई हैं।
उनकी यह उपलब्धि उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो शारीरिक या सामाजिक चुनौतियों से जूझते हुए अपने सपनों तक पहुंचने में संकोच महसूस करते हैं।
बचपन से संघर्ष, पिता बने सबसे बड़ी प्रेरणा
वृंदाणी का बचपन कठिनाइयों से भरा रहा। मात्र डेढ़ साल की उम्र में माता-पिता का तलाक हो गया। उनका पालन-पोषण पिता और दादी ने किया। उनके पिता, जो खुद तीन फीट लंबे हैं और एक शिक्षक हैं, ने हर परिस्थिति में उनका साथ दिया।
वृंदाणी कहती हैं—
“मेरे पिता मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने कभी मुझे निराश नहीं होने दिया और अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया।”

शिक्षा में हमेशा रही आगे
स्कूल से ही वृंदाणी पढ़ाई में मेधावी रहीं। उन्हें 12वीं तक स्पेशल बेंच दी गई ताकि वे आराम से पढ़ सकें।
- 10वीं में: 81%
- 12वीं में: 85%
इसके बाद उन्होंने बी.कॉम और एम.कॉम टॉप रिजल्ट के साथ पूरे किए। डॉक्टर बनने का सपना छोड़कर उन्होंने कॉमर्स में अपना करियर बनाया और GSET, NET जैसी कठिन परीक्षाएँ पास कीं। हाल ही में उन्होंने Ph.D. पूरी की।
पोस्ट-ग्रैजुएशन के बाद उन्होंने सूरत में पिता के ट्यूशन क्लास में पढ़ाया, जहां 200 से अधिक छात्रों को अकाउंटेंसी, स्टैटिस्टिक्स और ऑडिटिंग पढ़ाया।
रिजेक्शन के बावजूद नहीं टूटा हौसला
असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की राह आसान नहीं थी।
उन्होंने कुल 7 इंटरव्यू दिए, जिनमें से कई बार उन्हें सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया गया क्योंकि इंटरव्यू लेने वालों को लगता था कि वह क्लास संभाल नहीं पाएंगी।
लेकिन चौथे प्रयास में उन्हें सफलता मिली और उनका चयन हो गया।
3.5 साल की लड़ाई के बाद चलाया खुद की कार
वृंदाणी ने सामाजिक तानों को नजरअंदाज करते हुए हर चुनौती को हराया। उन्होंने 3.5 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2023 में ड्राइविंग लाइसेंस भी हासिल किया और आज अपनी कार खुद चलाती हैं।
वृंदाणी का संदेश
“रिजेक्शन से निराश न हों। कोशिश करते रहें।”
उनकी कहानी बताती है कि संकल्प, मेहनत और सकारात्मक सोच से कोई भी चुनौती असंभव नहीं रहती।

