देशभर में 5.4 लाख से अधिक राशन की दुकानें संचालित हैं। कोटेदारों को वेतन नहीं मिलता, बल्कि उनकी आय राशन वितरण पर मिलने वाले कमीशन पर निर्भर करती है। अलग-अलग राज्यों में यह कमीशन अलग है।
देश में करीब 80 करोड़ लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत हर महीने मुफ्त या रियायती दर पर राशन प्राप्त करते हैं। इस व्यवस्था की सबसे अहम कड़ी फेयर प्राइस शॉप (एफपीएस) यानी राशन की दुकानें हैं, जिन्हें आम भाषा में कोटे की दुकान कहा जाता है। इन दुकानों का संचालन करने वाले को कोटेदार कहा जाता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के कोटेदारों ने कमीशन बढ़ाने और बकाया भुगतान की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया है।
कोटेदारों की कमाई कैसे होती है?
कोटेदारों को किसी प्रकार का मासिक वेतन नहीं मिलता। उनकी आय मुख्य रूप से राशन वितरण पर मिलने वाले कमीशन पर आधारित होती है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत प्रति क्विंटल खाद्यान्न वितरण के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता देती है। इसके अलावा राज्य सरकारें अपनी नीतियों के अनुसार अतिरिक्त कमीशन या मानदेय भी दे सकती हैं। यही कारण है कि हर राज्य में कोटेदारों की आय अलग-अलग होती है।
किस राज्य में कितना मिलता है कमीशन?
विभिन्न राज्यों में कोटेदारों को मिलने वाला कमीशन अलग-अलग है।
- उत्तर प्रदेश: ₹90 प्रति क्विंटल
- बिहार: ₹258.40 प्रति क्विंटल
- महाराष्ट्र: ₹170 प्रति क्विंटल
- राजस्थान: ₹150.70 प्रति क्विंटल
- मध्य प्रदेश: ₹70 प्रति क्विंटल
- छत्तीसगढ़: ₹120 प्रति क्विंटल
उत्तर प्रदेश के कोटेदारों की मांग है कि उनका कमीशन ₹90 से बढ़ाकर ₹200 प्रति क्विंटल किया जाए।
अतिरिक्त आय के क्या साधन हैं?
कई राज्यों में राशन दुकानों को अतिरिक्त सेवाओं से जोड़कर कोटेदारों की आय बढ़ाने का प्रयास किया गया है।
- उत्तर प्रदेश में ई-पीओएस मशीन, डिजिटल भुगतान और अन्य डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
- राजस्थान में कई राशन दुकानों को ई-मित्र सेवाओं से जोड़ा गया है, जहां बिजली बिल जमा कराने और सरकारी प्रमाण पत्र जैसी सेवाओं से अतिरिक्त आय होती है।
- मध्य प्रदेश में कई दुकानों को कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) से जोड़ा गया है।
- केरल और तमिलनाडु में अधिकांश राशन दुकानें सहकारी संस्थाओं द्वारा संचालित होती हैं, जहां कई कर्मचारियों को नियमित वेतन और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं।
एक कोटेदार की औसत मासिक कमाई
कोटेदार की आय इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी दुकान से कितने राशन कार्ड जुड़े हैं और हर महीने कितना खाद्यान्न वितरित होता है।
- छोटे गांवों की दुकानें: ₹8,000 से ₹15,000 प्रतिमाह
- मध्यम आकार की दुकानें: ₹15,000 से ₹30,000 प्रतिमाह
- अधिक लाभार्थियों वाली दुकानें: ₹40,000 से ₹50,000 प्रतिमाह तक
हालांकि, कोटेदारों का कहना है कि किराया, परिवहन, बिजली, कर्मचारियों का खर्च और अन्य संचालन लागत निकालने के बाद वास्तविक बचत काफी कम रह जाती है।
कोटेदारों की प्रमुख मांगें
कोटेदार लंबे समय से कई मांगें उठाते रहे हैं। इनमें 30,000 से 50,000 रुपये मासिक मानदेय, सरकारी कर्मचारी का दर्जा, पेंशन, स्वास्थ्य और दुर्घटना बीमा, परिवहन खर्च का भुगतान तथा समय-समय पर कमीशन बढ़ाने की मांग शामिल है। उनका कहना है कि मुफ्त राशन योजना के विस्तार के साथ काम और जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, लेकिन कमीशन में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई।
हर राज्य में अलग क्यों है कमीशन?
भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर करती हैं। केंद्र सरकार खाद्यान्न उपलब्ध कराती है और न्यूनतम वित्तीय सहायता तय करती है, जबकि राशन दुकानों के संचालन, अतिरिक्त कमीशन, मानदेय और अन्य सुविधाओं का निर्णय राज्य सरकारें अपने बजट और नीतियों के अनुसार लेती हैं। इसी वजह से राज्यों में कोटेदारों की आय और सुविधाओं में बड़ा अंतर देखने को मिलता है।

