भारत का स्वदेशी ‘काल’ ड्रोन इन दिनों दुनिया भर में चर्चा में है। बदलते युद्ध के दौर में ड्रोन सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुके हैं। अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन जैसे संघर्षों में ड्रोन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में भारत का लंबी दूरी वाला ‘काल’ ड्रोन भी खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
ड्रोन स्वार्म ने बदली युद्ध की रणनीति
ड्रोन स्वार्म का मतलब है कि कई ड्रोन एक साथ मिलकर किसी मिशन को अंजाम दें। ये अलग-अलग दिशाओं से लक्ष्य की ओर बढ़ सकते हैं और आपस में तालमेल बनाकर काम कर सकते हैं। बड़ी संख्या में ड्रोन एक साथ आने पर एयर डिफेंस सिस्टम के लिए उन्हें रोकना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने ड्रोन की सैन्य उपयोगिता को दुनिया के सामने रखा है। छोटे और सस्ते ड्रोन से लेकर लंबी दूरी तक हमला करने वाले सिस्टम तक, इनका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। रडार, सैन्य वाहन, कमांड सेंटर, गोला-बारूद के ठिकाने और तेल भंडार जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्यों को भी ड्रोन से निशाना बनाया जा रहा है।
ड्रोन तकनीक में अमेरिका सबसे आगे
अमेरिका को सैन्य ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख देशों में गिना जाता है। उसके पास निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, समुद्री गश्त और हमले के लिए कई तरह के ड्रोन मौजूद हैं।
अमेरिकी ड्रोन की बड़ी ताकत उनके सेंसर और संचार सिस्टम हैं। इनमें हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे, थर्मल सेंसर, रडार और सुरक्षित डेटा लिंक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कई सिस्टम लंबी दूरी के संचार नेटवर्क से जुड़े होते हैं और कुछ ड्रोन को सैटेलाइट संचार के जरिए हजारों किलोमीटर दूर से नियंत्रित किया जा सकता है।
चीन भी तेजी से बढ़ा रहा ड्रोन ताकत
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन निर्माण के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। उसके पास छोटे निगरानी ड्रोन से लेकर बड़े सशस्त्र ड्रोन तक कई विकल्प हैं। चीन ड्रोन का निर्यात भी करता है, जिससे उसकी तकनीक कई देशों तक पहुंची है।
चीन लंबी दूरी, ज्यादा उड़ान समय और अधिक पेलोड क्षमता वाले ड्रोन के साथ-साथ स्वार्म तकनीक पर भी तेजी से काम कर रहा है।
ईरान के शाहेद ड्रोन ने खींचा ध्यान
ईरान के शाहेद ड्रोन की चर्चा खास तौर पर उनकी लंबी दूरी और अपेक्षाकृत कम लागत के कारण होती है। इनका इस्तेमाल बड़ी संख्या में किया जा सकता है, जिससे दुश्मन की एयर डिफेंस व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।
ऐसे ड्रोन की लागत कम होने के कारण उन्हें रोकने के लिए महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
भारत के ‘काल’ ड्रोन की क्यों हो रही चर्चा?
इसी बदलते युद्ध के बीच भारत का स्वदेशी ‘काल’ ड्रोन चर्चा में आया है। इसे निजी क्षेत्र की कंपनी आईजी डिफेंस ने तैयार किया है। कंपनी के अनुसार, यह एक वन-वे अटैक ड्रोन है, जिसे मिशन पूरा करने के बाद वापस लौटने के बजाय लक्ष्य पर हमला करने के लिए डिजाइन किया गया है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसकी रेंज करीब 1,000 किलोमीटर बताई गई है और यह लंबी दूरी के मिशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी उड़ान क्षमता करीब 7 से 8 घंटे तक बताई जाती है, जबकि लगभग 200 किलोग्राम तक पेलोड ले जाने की क्षमता का दावा किया गया है।
कंपनी के अनुसार, इसमें कैमरे, थर्मल सेंसर, नेविगेशन सिस्टम और सुरक्षित डेटा लिंक जैसी तकनीकें भी शामिल हैं। हालांकि, इन क्षमताओं का वास्तविक प्रदर्शन परीक्षण और सैन्य इस्तेमाल के बाद ही स्पष्ट होगा।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ‘काल’ ड्रोन?

भारत की पश्चिमी सीमा पाकिस्तान और उत्तरी एवं पूर्वी दिशा में चीन से लगती है। इन सीमाओं पर पहाड़, रेगिस्तान और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां मौजूद हैं। ऐसे में लंबी दूरी तक पहुंचने वाला ड्रोन सेना के लिए उपयोगी विकल्प साबित हो सकता है।
यह दुश्मन के इलाके में मौजूद महत्वपूर्ण ठिकानों की निगरानी करने के साथ जरूरत पड़ने पर सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाने में भी सक्षम हो सकता है।
हालांकि, किसी ड्रोन की क्षमता केवल उसकी रेंज से तय नहीं होती। युद्ध क्षेत्र में जीपीएस जैमिंग, इलेक्ट्रॉनिक हमले, लक्ष्य की सटीक पहचान और सुरक्षित संचार जैसी कई चुनौतियां होती हैं। इसलिए ‘काल’ जैसे ड्रोन की वास्तविक क्षमता उसके सेंसर, नेविगेशन, संचार, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा और लक्ष्य भेदने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
ड्रोन निर्माण में भारत के सामने चुनौतियां
भारत के लिए चुनौती केवल लंबी दूरी के ड्रोन विकसित करने की नहीं, बल्कि उन्हें बड़े पैमाने पर तैयार करने की भी है। ऐसे सिस्टम को पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदानी इलाकों जैसी अलग-अलग परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम होना होगा।
इसके अलावा ड्रोन की लागत भी महत्वपूर्ण है। भविष्य के युद्ध में बड़ी संख्या में ड्रोन की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में भारत को ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी, जिसे कम लागत में बड़े पैमाने पर बनाया और जरूरत के समय तेजी से तैनात किया जा सके।

