
चुनावी नतीजों से साफ है कि बिहार में लंबे समय से नेतृत्व के सूखे का सामना कर रही मुस्लिम बिरादरी ने इस बार नया नेतृत्व चुन लिया है। वर्षों से राजद के M-Y (मुस्लिम-यादव) समीकरण का हिस्सा रही यह आबादी अब AIMIM की ओर झुक गई है। मुस्लिम वोटों में भारी बंटवारे के कारण इस बार केवल 11 मुस्लिम उम्मीदवार ही जीत पाए, जिनमें से 5 AIMIM से हैं। राजद को सिर्फ तीन और कांग्रेस को दो मुस्लिम जीत मिले, जबकि जदयू से एक मुस्लिम विधायक जीता।
ओवैसी की रणनीति ने सीमांचल से लेकर कई मुस्लिम क्षेत्रों में दिखाई ताकत
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सीमांचल के साथ-साथ राज्य की कई मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर अपनी ताकत का पूरा अहसास कराया। पार्टी ने अपनी पिछली सभी पांच सीटें—बायसी, अमौर, जोकीहाट, बहादुरगंज और कोचाधामन—इस बार भी बरकरार रखीं। इसके अलावा बलरामपुर, दरभंगा ग्रामीण, प्राणपुर, ठाकुरगंज और शेरघाटी जैसी सीटों पर AIMIM उम्मीदवार दूसरे या तीसरे स्थान पर रहे, जिससे विपक्षी महागठबंधन को बड़ा नुकसान हुआ।
AIMIM को 9.3 लाख वोट, कई सीटों पर बढ़ा प्रभाव
पिछली बार जहां AIMIM के उम्मीदवार अधिकतर सीटों पर 2–3 हजार वोट ही प्राप्त कर पाते थे, वहीं इस चुनाव में पार्टी के 25 में से 16 उम्मीदवारों को 10,000 से लेकर 1 लाख से अधिक वोट मिले। पार्टी को कुल 1.85% वोट शेयर (9,30,504 वोट) प्राप्त हुए। सीमांचल की चार सीटों में से दो पर AIMIM ने शानदार जीत दर्ज की—बहादुरगंज से तौसीफ आलम ने 85,300 वोट और कोचाधामन से सरवर आलम ने 81,860 वोट हासिल किए।
महागठबंधन को मुस्लिम नाराज़गी का भारी नुकसान
लगभग 18% मुसलमान पिछले तीन दशकों से राजद-महागठबंधन के स्थायी वोटर रहे हैं। लेकिन इस बार महागठबंधन द्वारा किसी मुस्लिम चेहरे को डिप्टी सीएम उम्मीदवार न बनाना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। इसका सीधा असर नतीजों में दिखा। AIMIM की मजबूत दावेदारी और मुस्लिम नाराज़गी ने महागठबंधन के कई समीकरण बिगाड़ दिए।
विधानसभा में अब तक का सबसे कम मुस्लिम प्रतिनिधित्व
इस बार बिहार विधानसभा में 21वीं सदी का सबसे कम मुस्लिम प्रतिनिधित्व होगा। एनडीए से केवल जदयू के जमा खान ही एकमात्र मुस्लिम विधायक चुने गए हैं। यह आंकड़ा पहले की तुलना में बेहद कम है—2005 में 16, 2010 में 19, 2015 में 24 और पिछली बार 19 मुस्लिम विधायक जीते थे।
कांग्रेस नेता मुमताज पटेल ने भी AIMIM की ओर इशारा करते हुए कहा कि मुस्लिम वोट बैंक को हल्के में लेने का नतीजा है कि जब भी उन्हें तीसरा विकल्प मिलता है, वे उसकी ओर झुक जाते हैं।

