सीजेपी प्रदर्शन से जुड़े मामलों पर रविवार को विशेष सुनवाई, अदालत ने आवाजाही सामान्य करने और जरूरत के मुताबिक ही बैरिकेड रखने को कहा।
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों और हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को सुनवाई की। जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोके जाने से संबंधित अवमानना याचिका तथा हिरासत में लिए गए लोगों के संबंध में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने दिल्ली पुलिस को अवमानना नोटिस जारी किया और शहर में आवाजाही तथा इंटरनेट सेवा सामान्य करने के निर्देश दिए।
बैरिकेड हटाने और मेट्रो सेवा सामान्य रखने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों को अपने पेशे से जुड़े काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए और मेट्रो को सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलाया जाना चाहिए। अदालत ने दिल्ली में जगह-जगह लगाए गए बैरिकेड हटाने और उन्हें केवल जरूरत वाले स्थानों पर रखने को कहा। साथ ही, इंटरनेट सेवा सामान्य रूप से बहाल करने तथा लोगों की आवाजाही सुचारू बनाने का निर्देश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए जरूरत पड़ने पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 19(2) का भी उल्लेख किया। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
पुलिस की कार्रवाई और नागरिक अधिकारों पर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस को असीमित अधिकार नहीं मिल जाते। अदालत ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है, चाहे संबंधित व्यक्ति पुलिसकर्मी हो, वकील हो या आम नागरिक। अदालत ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन कानून के दायरे में होना चाहिए और इसे पुलिस कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मोहना ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण रहने और किसी तरह की उकसावे वाली कार्रवाई नहीं करने का आश्वासन देने को कहा। अदालत ने कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 का बोर्ड हटाने की बात भी कही।
वकीलों ने हिरासत और प्रतिबंधों का मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, मेनका गुरुस्वामी और शादान फरासत समेत अन्य वकीलों ने दलीलें रखीं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लिया गया, वकीलों को थानों में अपने मुवक्किलों से मिलने से रोका गया और कुछ स्थानों पर पुलिसकर्मियों ने नेमप्लेट या बैज नहीं पहने थे। वकीलों ने बैरिकेड हटाने, लोगों की आवाजाही बहाल करने और पुलिसकर्मियों की पहचान सुनिश्चित करने की मांग की।
शादान फरासत ने हिरासत के दौरान अपने साथ कथित दुर्व्यवहार का जिक्र किया। अन्य वकीलों ने भी पुलिस कार्रवाई और अदालत तक पहुंचने में आई मुश्किलों का मुद्दा उठाया। सुनवाई के दौरान कुछ वकीलों के नारे लगाने पर पीठ ने नाराजगी जताई। जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत लोगों के जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर मामले की तह तक जाएगी।
7000 लोगों की हिरासत का दावा, पुलिस ने किया खंडन
कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें छात्र नेता, पत्रकार और अन्य लोग शामिल थे। एक वरिष्ठ वकील ने तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को हिरासत में लिए जाने का भी दावा किया, जबकि मेनका गुरुस्वामी ने चार पूर्व मुख्यमंत्रियों का जिक्र किया। हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या को लेकर अदालत में अलग-अलग दावे रखे गए।
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को शाम तक छोड़ दिया गया था, इसलिए उनके संबंध में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अब प्रभावी नहीं रह जाती। उन्होंने यह भी कहा कि अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाए गए और मेट्रो सेवाएं चल रही थीं।
45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश-निकास रोके जाने पर सवाल
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 45 पर प्रवेश और निकास रोका गया था। उन्होंने कहा कि सभी स्टेशन शनिवार रात 10 बजे से पूरी तरह खोल दिए गए। इस पर पीठ ने सवाल किया कि पहले 57 स्टेशनों के बंद होने की बात कही गई थी और बाद में संख्या 45 बताई गई, तो इन स्टेशनों को बंद करने का आधार क्या था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से जीटीबी नगर और विश्वविद्यालय समेत कुछ स्टेशनों को बंद रखे जाने का मुद्दा उठाया गया। अदालत ने कहा कि वह सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई कर रही है और अन्य याचिकाओं पर उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जाएगा। मामले में अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

