
आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामाराजू जिले में सुरक्षा बलों ने माओवादी नेता मादवी हिडमा को मंगलवार तड़के मार गिराया है। यह सफलता एक विशेष अभियान के दौरान मिली, जिसमें सुरक्षा बलों ने चार घंटे लंबी मुठभेड़ लड़ी। इससे माओवादियों की शीर्ष कमांडर की मौत हो गई, जो संगठन के लिए एक बड़ा झटका है।
सुरक्षा बलों की योजना और सफलता का राज
बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक पी सुंदरराज के अनुसार, स्थानीय खुफिया सूत्रों ने हिडमा की गतिविधियों की सटीक जानकारी दी थी। इसके बाद खुफिया एजेंसियों ने 34 घंटे तक उसकी हरकतों पर नजर रखी। केंद्रीय बलों की सहायता से विशेष ग्रेहाउंड्स टीम ने इस अभियान को अंजाम दिया। यह रणनीतिक कार्रवाई माओवादी विरोधी अभियानों में एक मील का पत्थर मानी जा रही है।
मुठभेड़ और हिडमा का अंत
रात करीब 2 बजे हिडमा के जंगल में मौजूदगी का पता चलने के बाद, सुरक्षा बलों ने त्वरित कार्रवाई की। दोनों पक्षों के बीच लगभग चार घंटे तक भीषण गोलीबारी हुई, जिसमें हिडमा को मार गिराया गया। इस मुठभेड़ के दौरान उसकी सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए कई टीमों ने रणनीतिक रूप से तैनाती की थी। सुबह लगभग 6 बजे उसकी मौत की पुष्टि हुई।
माओवादी संगठन में हिडमा का चरित्र और प्रारंभिक जीवन
मादवी हिडमा का जन्म 1981 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुवार्ती गांव में एक गरीब आदिवासी परिवार में हुआ था। गरीबी और शोषण से प्रेरित होकर, वह 16 वर्ष की उम्र में पूर्णकालिक माओवादी सदस्य बन गया। जंगल में प्रशिक्षण और संगठन के साथ उसकी शुरुआत हुई, जिसने उसे संगठन का मजबूत हिस्सा बना दिया।
युवा माओवादी नेता के रूप में उभरना
हिडमा ने अपने शुरुआती वर्षों में पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी (PLGA) में शामिल होकर हथियार चलाना और रणनीति सीखना शुरू किया। 2000 के दशक में वह सिपाही से डिप्टी कमांडर बना और 2010 तक बटालियन नंबर-1 का कमांडर बन गया। 2012-13 में वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सदस्य बना और 2017 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की सेंट्रल कमेटी में शामिल हो गया, जो उसकी तेज उन्नति का संकेत था।
प्रमुख हमले और आतंक का पर्याय
हिडमा ने छत्तीसगढ़ में 26 बड़े हमले किए, जिनसे उसकी खौफनाक छवि बनी। 2010 में दंतेवाड़ा में IED हमले से 76 जवानों की मौत, 2013 में झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं समेत 27 लोगों की हत्या और 2017, 2021 में सुरक्षा बलों पर हमले उसकी आतंक की कहानी कहते हैं। इन घटनाओं ने देश में खौफ का माहौल बनाया।
‘शैडो कमांडर’ के रूप में प्रसिद्धि
हिडमा को ‘शैडो कमांडर’ कहा जाता था, क्योंकि वह हमलों की सटीक योजना बनाने में माहिर था। उसकी सुरक्षा कड़ी थी, और वह जंगल में अपने घने घेरे में चलता था। 2025 तक वह नक्सल हिंसा का सबसे वांछित चेहरा बन गया था, और उस पर देश-विदेश में इनाम घोषित थे। उसकी रणनीति और सुरक्षा व्यवस्था उसकी खतरनाक छवि को दर्शाती है।
सुरक्षा बलों की रणनीति और हिडमा का अंत
सुरक्षा बलों ने हिडमा को वर्षों तक पकड़ने में सफलता नहीं पाई थी, क्योंकि वह जंगल में अपने तीन सुरक्षा घेरे बनाए रखता था। जंगल का गहरा ज्ञान और स्थानीय समर्थन उसकी ताकत थी। लेकिन, मंगलवार की कार्रवाई में उसकी मौत ने माओवादी संगठन को बड़ा झटका दिया है। यह भारत की नक्सल विरोधी कार्रवाई में एक ऐतिहासिक सफलता है।
निष्कर्ष: माओवादियों के लिए बड़ा झटका
आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक हरीश कुमार गुप्ता ने कहा कि हिडमा की मौत माओवादियों के मनोबल के लिए एक बड़ा झटका है। उसकी हत्या से संगठन कमजोर होगा और नक्सल हिंसा पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। यह सफलता सुरक्षा बलों की समर्पित मेहनत और रणनीतिक योजना का परिणाम है, जो देश की एकता और सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

