यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 लागू किए हैं। इन नए नियमों के तहत देश की हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य कर दिया गया है।
यह कमेटी एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों से जुड़ी भेदभाव की शिकायतों को सुनेगी और तय समयसीमा में उनका निपटारा करेगी। नियमों के अनुसार, इस कमेटी में एससी-एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी। कमेटी का उद्देश्य कैंपस में समानता का माहौल बनाना और पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करना है।
❓ इन नियमों की जरूरत क्यों पड़ी?
UGC ने ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बनाए हैं। वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों की सुनवाई के दौरान UGC को 8 हफ्तों के भीतर सख्त नियम बनाने का आदेश दिया था।
रोहित वेमुला (हैदराबाद यूनिवर्सिटी) और पायल तड़वी (मुंबई मेडिकल कॉलेज) की कथित जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या के बाद उनके परिवारों ने जनहित याचिका दायर की थी। कोर्ट ने 2012 के पुराने नियमों को अपर्याप्त बताते हुए उन्हें अपडेट करने को कहा था।
📊 UGC रिपोर्ट में क्या सामने आया?
UGC ने सुप्रीम कोर्ट में पेश रिपोर्ट में बताया कि
- 2017-18 में जातिगत भेदभाव की 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं
- 2023-24 में यह संख्या बढ़कर 378 हो गई
- यानी 5 साल में 118.4% की बढ़ोतरी
हालांकि 90% से ज्यादा मामलों का निपटारा हुआ, लेकिन पेंडिंग केस 2019-20 में 18 से बढ़कर 2023-24 में 108 हो गए।
⚖️ भेदभाव की परिभाषा भी स्पष्ट
नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा भी साफ की गई है।
एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ कोई भी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार, जिससे उनकी गरिमा या शिक्षा में समानता प्रभावित हो — उसे भेदभाव माना जाएगा। ऐसे मामलों में इक्विटी कमेटी दोषियों पर कड़ी कार्रवाई कर सकेगी।
🚨 विरोध क्यों हो रहा है?
इन नियमों का सवर्ण (जनरल कैटेगरी) के छात्र विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि नियम केवल पिछड़े वर्गों की सुरक्षा पर केंद्रित हैं और सवर्ण छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव का कोई जिक्र नहीं है।
विरोध करने वालों का कहना है कि
- झूठी शिकायतों का खतरा बढ़ेगा
- नियमों का दुरुपयोग हो सकता है
इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि ये नियम UGC एक्ट और उच्च शिक्षा में समान अवसर की भावना के खिलाफ हैं।
🔍 निष्कर्ष
UGC ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश और बढ़ते मामलों के आंकड़ों के आधार पर ये सख्त नियम लागू किए हैं। एक ओर जहां दलित-पिछड़े छात्रों की सुरक्षा को जरूरी बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सवर्ण छात्रों को नियमों के दुरुपयोग का डर सता रहा है। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और देशभर की यूनिवर्सिटियों में इस पर बहस तेज हो गई है।

