Year Ender 2025: दिल्ली-बिहार चुनाव में सर्वे एजेंसियां क्यों रहीं फेल? जानिए किसका अनुमान रहा सबसे करीब

Thecity news
3 Min Read

साल 2025 अब अपने आखिरी दौर में है। महज पांच दिन बाद देश नववर्ष 2026 में प्रवेश करेगा। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह साल बेहद अहम और घटनापूर्ण रहा। इस दौरान दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव हुए, जहां दोनों ही राज्यों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बनी।

हालांकि इन चुनावों में जितना बड़ा झटका विपक्षी दलों को लगा, उतना ही बड़ा झटका एग्जिट पोल और ओपिनियन पोल कराने वाली सर्वे एजेंसियों को भी लगा। अधिकतर एजेंसियां जनता के असली मूड को भांपने में नाकाम रहीं। इस पॉलिटिकल ईयर एंडर में जानते हैं कि कौन सी एजेंसियां फेल हुईं और किसका अनुमान नतीजों के करीब रहा


दिल्ली चुनाव: ओपिनियन पोल बनाम हकीकत

दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले सी वोटर के ओपिनियन पोल में आम आदमी पार्टी को बढ़त दिखाई गई थी। सर्वे में AAP को 51% वोट शेयर के साथ सरकार बनाते दिखाया गया, लेकिन 8 फरवरी को आए नतीजों ने सभी अनुमानों को पलट दिया।

भाजपा ने 48 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई, जबकि AAP महज 22 सीटों पर सिमट गई। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल को भी हार का सामना करना पड़ा।


दिल्ली एग्जिट पोल: कौन कितना चूका?

वोटिंग के बाद आए एग्जिट पोल्स में अलग-अलग एजेंसियों ने अलग-अलग अनुमान लगाए। कुछ ने मुकाबला कांटे का बताया, तो कुछ ने AAP या BJP की बड़ी जीत का दावा किया।

हालांकि नतीजों के सबसे करीब P-Marq का सर्वे रहा, जिसने भाजपा की जीत का तुलनात्मक रूप से सटीक अनुमान लगाया।


बिहार चुनाव: जीत का अनुमान सही, आंकड़े फेल

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लगभग सभी ओपिनियन पोल्स ने एनडीए की जीत की भविष्यवाणी की थी। एग्जिट पोल्स में भी एनडीए को बढ़त दिखाई गई, लेकिन 14 नवंबर को आए नतीजों ने सभी सर्वे एजेंसियों को चौंका दिया।

एनडीए ने 202 सीटों पर जीत दर्ज कर बंपर बहुमत हासिल किया, जबकि किसी भी एजेंसी ने 167 से ज्यादा सीटों का अनुमान नहीं लगाया था। इस लिहाज से कहा जाए तो सरकार का अनुमान सही रहा, लेकिन सीटों का आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ


क्या सिखाते हैं ये चुनावी सर्वे?

दिल्ली और बिहार चुनावों से यह साफ है कि

  • केवल रैलियों की भीड़ से जनता का मूड नहीं समझा जा सकता
  • अंतिम चरण तक जमीनी हालात पर नजर रखना जरूरी है
  • सर्वे एजेंसियों को डेटा के साथ ग्राउंड फीडबैक पर भी फोकस करना होगा

आखिरकार, चुनाव नतीजे ही अंतिम सच्चाई होते हैं, न कि सर्वे के आंकड़े।

Share This Article