महाराष्ट्र के शीतकालीन सत्र से पहले विधानसभा और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष पद खाली है। उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म कर रही है और विपक्ष के नेता से डर रही है। जानें पूरा मामला।
Maharashtra News: शीतकालीन सत्र से पहले दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष पद खाली, उद्धव ठाकरे ने साधा निशाना
महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट) और राकां (अजीत पवार) के गठबंधन वाली महायुति सरकार 2.0 का शीतकालीन सत्र सोमवार से नागपुर में शुरू होने जा रहा है। इस बार सत्र की शुरुआत एक असाधारण स्थिति के बीच होने वाली है, क्योंकि राज्य के इतिहास में पहली बार विधानसभा और विधान परिषद दोनों सदनों में आधिकारिक रूप से कोई नेता प्रतिपक्ष (LoP) मौजूद नहीं है।
उद्धव ठाकरे का आरोप – “सरकार ने लोकतांत्रिक मूल्य खत्म कर दिए”
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने लोकतांत्रिक परंपराओं को खत्म कर दिया है। विपक्ष में संख्या कम होने के बावजूद सरकार को नेता प्रतिपक्ष का पद देना चाहिए था।
उद्धव ने कहा कि अगर सरकार को इतना डर है, तो उपमुख्यमंत्री का पद भी निरस्त कर देना चाहिए, क्योंकि संविधान में इसका भी कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उन्होंने पूछा कि दिल्ली के समर्थन के बावजूद सरकार विपक्ष के नेता के पद से क्यों घबरा रही है।
दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष का पद क्यों खाली?
2024 के विधानसभा चुनाव में विपक्ष को पर्याप्त सीटें न मिलने पर नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति नहीं हो सकी। दूसरी ओर, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष रहे अंबादास दानवे का कार्यकाल भी समाप्त हो गया। इन दोनों कारणों से वर्तमान स्थिति उत्पन्न हुई है।
भास्कर जाधव का आवेदन अब तक लंबित
पिछले वर्ष विधानसभा सचिवालय ने स्पष्ट किया था कि नेता प्रतिपक्ष के लिए 10% सीटों का नियम कोई आधिकारिक कानूनी प्रावधान नहीं है। इस आधार पर शिवसेना (यूबीटी) ने भास्कर जाधव को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को आवेदन दिया था।
हालांकि बजट सत्र, मानसून सत्र और उसके बाद भी इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। वहीं दूसरी ओर, विधान परिषद में एलओपी रहे अंबादास दानवे का कार्यकाल समाप्त होने से वहां भी पद खाली हो गया।
महाराष्ट्र की राजनीति में नई संवैधानिक बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष की भूमिका लोकतांत्रिक ढांचे में बेहद महत्वपूर्ण होती है। दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष का न होना पहली बार एक बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न खड़ा कर रहा है।
राज्य के शीतकालीन सत्र में यह मुद्दा गर्माने की पूरी संभावना है।

